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भिक्षा यात्रा

आज देवबंद की धरती से बड़ा संदेश है, समूचे सनातनी हिंदुओं के लिए, ध्यान से सुनो गर्व होगा। एक थे एक हैं और रहेंगे.. हिंदू मतलब…यह भिक्षा यात्रा की ताक़त दिन 193
स्वामी दीपांकर — 1008 दिन की ऐतिहासिक भिक्षा यात्रा


 परिचय : एक इतिहास का सृजन

एक संन्यासी का कालजयी संकल्प जिसने पूरे देश की चेतना को झकझोर दिया।

भारत में जातिभेद, सामाजिक बिखराव और नशे की बढ़ती समस्या के खिलाफ एक संन्यासी ने ऐसी अलख जगाई कि हिंदुत्व की बिखरती मानव श्रंखलाएँ एकता, सद्भाव और अपनत्व की त्रिवेणी में एकाकार हो उठीं। 

हमारी वैदिक ऋषि परंपरा का विराट हिंदुत्व स्वप्न अपने गौरवशाली इतिहास को एक बार पुनः प्राप्त करने की खातिर मचल उठा।

हिंदुत्व के पुनर्जागरण की उम्मीदों का समुद्र मंथन-

स्वामी दीपांकर का ये प्रयास हिंदुत्व के पुनर्जागरण, उसकी प्राण प्रतिष्ठा की आतुर उम्मीदों के समुद्र मंथन सा विराट रहा। उन्होंने इस एक स्वप्न की खातिर अनथक यात्राएं की।

सहारनपुर के देवबंद से शुरू हुई स्वामी दीपांकर की भिक्षा यात्रा अब तक -

6 राज्यों (UP, Delhi, Uttarakhand, Bihar, Telangana, Haryana)

16,000–20,000 किलोमीटर दूरी

1008 दिन की लगातार पदयात्रा

1.10 करोड़ से अधिक लोगों का जुड़ाव

के साथ भारतीय संत परंपरा की सबसे लंबी, सुनियोजित और प्रभावशाली सामाजिक यात्रा बन चुकी है।

स्वामी जी का स्पष्ट संदेश -
“मुझे आटा, चीनी, चावल या पैसा नहीं चाहिए…
मेरी भिक्षा सिर्फ एक- हिंदू समाज की एकता”


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उद्देश्य : ‘पहले राष्ट्र - नो कास्ट’

इस यात्रा की मुख्य भिक्षा

“पहले राष्ट्र - नो कास्ट”

आज का हिंदू समाज जातियों में खंड-खंड होकर अपने सुनहरे और गौरवशाली अतीत की एक धुंधली विखंडित छाया बन चुका है। ऐसे हिंदू समाज में हिंदू कम और जातियाँ ज्यादा दिखाई देती हैं -
ब्राह्मण, क्षत्रिय, यादव, ठाकुर, वैश्य, दलित…

ऐसे में स्वामी जी एक यक्ष प्रश्न पूछते हैं -

अस्पताल में खून लेते समय कोई जाति क्यों नहीं पूछता ?

गंगा स्नान में कोई जाति क्यों नहीं पूछता ?

विदेश में किसी भारतीय से मिलने पर कोई जाति क्यों नहीं पूछता ?

तो फिर अपने ही देश में जातियों में विभाजन क्यों?


प्रेरणा-

इस यात्रा में महान विचारों की अनंत श्रृंखला के उर्वरक घुले हुए हैं।

इस यात्रा की प्रेरणा है -

आदि शंकराचार्य का भारत को एक सूत्र में बाँधने का महाअभियान

संत रविदास की वाणी

डॉ. भीमराव अंबेडकर और डॉ. राममनोहर लोहिया का जातिवाद के खिलाफ संघर्ष


संदेश:
“जाति पाति पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई”


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सामाजिक सुधार : हिंदू समाज की एकता

ये अर्पण की यात्रा है। ये समर्पण का ध्येय है। समाज की खातिर आत्मविसर्जन का पाथेय है।

इस यात्रा का मुख्य लक्ष्य -

1- स्वामी दीपांकर की पहली भिक्षा :

जाति प्रथा का अंत

जन्म आधारित जाति विभाजन को समाप्त     करना

सामाजिक समरसता

हर हिंदू - एक हिंदू।
ना कोई ऊँच-नीच, ना भेदभाव

2- स्वामी दीपांकर की दूसरी भिक्षा :

युवा पीढ़ी को नशामुक्त बनाना

आज शराब, सिगरेट, गांजा, ड्रग्स…
हर उत्सव और हर गली में सामान्य हो चुका है

इस नशे ने -

परिवार तोड़े 

घर बर्बाद किए

युवा पीढ़ी को कमजोर बनाया

“नशा मुक्त हो युवा समाज”

परिवार से राष्ट्र तक

परिवार → समाज → राष्ट्र
यही स्वामी जी की सामाजिक दृष्टि है।


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 यात्रा की चुनौतियाँ और उपलब्धियाँ -

हालात, परिस्थितियों और विपरीत वातावरण की चुनौतियों से जूझती इस यात्रा ने तमाम प्रतिकूलताओं का सामना करते हुए भी विराट हिंदुत्व की उम्मीदों के कमल खिलाए हैं। यही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।

चुनौतियों की कठिन श्रृंखला-

कठिन मौसम की चुनौतियाँ 

2°C की सर्दी 

46°C की भीषण गर्मी

तेज बारिश

तूफान

धूल और प्रदूषण


इन्हें पार करते हुए यात्रा 1008 दिन लगातार बिना रुके, बिना थके, अविचलित आगे बढ़ती रही।

अभाव में प्रभाव और दृष्टि में समभाव की यात्रा-

इस यात्रा की पूंजी मात्र इतनी ही थी-

सादगी और तपस्या

भगवा वस्त्र

पैर में सिर्फ खड़ाऊँ

केवल संकल्प के सहारे यात्रा जारी है…


उपलब्धियाँ -

1.10 करोड़ लोगों का जुड़ाव

हजारों गांवों में संवाद

जातिविहीन हिंदू समाज का संदेश

युवाओं में नशामुक्ति का प्रभाव

संतों की परंपरा का पुनर्जीवन

यह यात्रा अब एक अनथक सामाजिक क्रांति में बदल चुकी है।


---

स्वामी दीपांकर : जीवन, साधना और आध्यात्मिक पृष्ठभूमि -

एक जीवन, जो ‘एक महान संकल्प और त्याग ही विकल्प’ के साँचे में फल फूलकर आगे बढ़ा, ये उसी जीवन के अनवरत स्मृति चिन्ह हैं-

जन्म : 10 दिसंबर 1976, मुज़फ्फरनगर

12 वर्ष की आयु में गुरु श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी के संरक्षण में आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत

देश–विदेश में ध्यान, धर्म और आध्यात्मिकता का विस्तार


स्वामी दीपाकंर आज -

एक आध्यात्मिक और सामाजिक चेतना के जनजागरण को करने वाले प्रखर सन्यासी 

उनका उद्देश्य स्पष्ट है -
“जातियों में विभाजित हिन्दू समाज एक रहे, संगठित रहे, अपराजेय रहे…
और अपने हिंदू होने के गर्व और स्वाभिमान को शान से जिए। 
युवा पीढ़ी को नशे से बचाएँ 
और भारत को एक मजबूत राष्ट्र बनाएँ।”


---

निष्कर्ष : भारत को एक सूत्र में बाँधने का संकल्प, 
हिंदुत्व का विराट कायाकल्प 

स्वामी दीपांकर की यह भिक्षा यात्रा सिर्फ एक आंदोलन नहीं,
यह 1.10 करोड़ लोगों की सामाजिक प्रतिज्ञा बन चुकी है।

यात्रा का सार-

पहले राष्ट्र - नो कास्ट

हिंदू मतलब हिंदू, बात खत्म

नशा मुक्त युवा भारत

सनातन मूल्यों का पुनर्जागरण

जाति विभाजन का अंत


अपील-

ये एक महान संकल्प की सिद्धि का पुण्य यज्ञ है, जो एक महान स्वप्न की वेदी में आपकी निःस्वार्थ भावनाओं की सतत आहुति का प्रार्थी है।

“अगर दूसरों के लिए नहीं तो अपने परिवार, अपने समाज और अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए…
इस यात्रा का हिस्सा बनें।
एक जातिवादमुक्त, नशामुक्त, संगठित हिंदू समाज -
हम सबकी जिम्मेदारी है ”

Saharanpur,  Uttar Pradesh

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